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जाने जबरदस्त योद्धा निज़ामुलमुल्क तूसी की कहानी जो इस्लामी इतिहास के सफलतम मंत्रियों में से एक

निज़ामुलमुल्क तूसी इस्लामी इतिहास के सफलतम मंत्रियों में से एक हैं उनकी गिनती विश्व के बड़े राजनीति शास्त्रियों में होती है वह एक कामयाब नौकरशाह , माहिर सियासतदां , महान शिक्षाविद , जबरदस्त योद्धा , बड़े आलिम व हाफ़िज़, अच्छे बाप , सफल गुरु और यारों के यार दोस्तों को न भूलने वाले थे



निज़ामुलमुल्क का असल नाम हसन बिन अली बिन इसहाक तूसी था वह सन् 1017 में ईरान के शहर तूस ( नया नाम मशहद अल रज़ा ) में पैदा हुए उनके पिता गज़नवी राज्य के कृषि मंत्रालय में काम करते थे और तूस के निकट बिहक नामी गांव में कार्यरत थे निज़ामुलमुल्क का बचपन बहुत गरीबी में गुज़रा दूध पीने की उम्र में मां का इंतकाल हो गया था.


बचपन की ग़रीबी व महरूमियों ने उनकी हिम्मत कम ना की बल्कि उन्होंने ठान लिया कि कुछ बनना है इनकी सोच क्या थी इस का अंदाजा इस से लगाया जा सकता है कि वह स्कूल में अपने सहपाठियों के साथ बैठे हुए थे जैसा आम तौर पर होता है सब बच्चे बात करने लगे कि बड़े हो कर क्या बनना है किसी ने कुछ बताया किसी ने कुछ , इनके सहपाठियों में महान गणितज्ञ व शायर उमर खैयाम भी थे उन्होंने कहा कि मैं बड़ा वैज्ञानिक बन कर पूरे विश्व में अपना नाम करना चाहता हूं निज़ामुलमुल्क खामोश थे आखिर में इनसे पूछा गया तो कहा कि मैं बड़ा हो कर किसी देश का राजा या मंत्री बनना चाहता हूं बच्चे हंसने और मजाक उड़ाने लगे लेकिन उमर खैयाम ने मज़ाक नहीं उड़ाया बल्कि कहा कि राजा या मंत्री बन कर मुझे भूल न जाना निज़ामुलमुल्क ने कहा कि बिल्कुल यह कोई कहने की बात है और सच में बड़े हो कर मंत्री बने और अपने बचपन के वचन को ऐसा निभाया कि वह भी इतिहास में दर्ज हो गया।


निजामुल मुल्क बड़े हो कर गज़नवी राज्य में कार्यरत हो गए यह वह जमाना था कि गज़नवी कमजोर पड़ रहे थे और मध्य एशिया में एक नई ताकत उभर रही थी वह सलजूकी तुर्को की ताक़त थी सलजूकी मध्य एशिया से निकल कर गज़नवी राज्य के शहर एक के बाद एक विजय करते जा रहे थे निजामुल मुल्क ने भी गजनवी राज्य की नौकरी छोड़ी और सलजूकियों से जा मिले बहुभाषी होने का लाभ मिला और धीरे धीरे तरक्की करने लगे सहमंत्री बने फिर बादशाह अल्प अरसलान के खास व विश्वास पात्र लेखक ( कातिब ) और आखिर में मंत्री ( प्रधानमंत्री ) बन गए.


इस तरह एक गांव के गरीब परिवार में पैदा होने वाला यह बालक जिसने बचपन में अपनी मां को खो दिया था अपनी मेहनत व महत्वकांक्षाओं के चलते एक बड़े देश का मंत्री बन गया.

मंत्री बन कर भी रुके नहीं बल्कि अपनी सलाहियत व काबिलियत का लोहा मनवाते रहे बादशाह अलप अरसलान ने उन्हें निज़ामुल मुल्क की उपाधि दी , अब्बासी खलीफा ने रज़ा अमीरुल मोमिनीन की उपाधि दी यह ऐसी उपाधि थी जो इनसे पहले या बाद में किसी दूसरे को नहीं मिली.

इसी बीच पूर्वी यूरोप के देश जोर्जिया के राजा ने बगावत कर दिया बादशाह अलप अरसलान ने इनके नेतृत्व में एक सेना भेजी निजामुल मुल्क ने वहां जाकर बगावत को खत्म किया और युद्ध के मैदान में भी अपनी उपयोगिता सिद्ध कर दी.
जोर्जिया से लौटने के बाद बादशाह ने एक और महत्वपूर्ण जिम्मेदारी इन्हें सौंपी वह थी युवराज मलिक शाह की शिक्षा की जिम्मेदारी निज़ामुल मुल्क ने इसे भी अच्छी तरह निभाया आज इतिहास में मलिक शाह सलजूकी का जो नाम है उसमें उनके गुरु निज़ामुल मुल्क का बहुत बड़ा हाथ है.

निज़ामुल मुल्क तीस साल मंत्री रहे और सलजूकी राज्य की तरक्की के लिए काम करते रहे इन्होंने जनता की भलाई के लिए ठोस कदम उठाए जिस से इनकी गिनती सफल मंत्रियों में होती है इन्होंने कई किताबें लिखीं , राजनीति शास्त्र में इनकी किताब " सियरुल मलूक " है जिसका अनुवाद खुद उन्होंने फारसी भाषा में " सियासत नामा " के नाम से किया था सियासत नामा इतनी मशहूर हुई कि विश्व की कई भाषाओं में उसका अनुवाद हुआ और आज भी यह किताब पुस्तकालयों में मौजूद है.

निज़ामुल मुल्क का सबसे बड़ा काम जिसने उन्हें आज तक जिंदा रखा हुआ है वह है शिक्षा के प्रति उनकी दीवानगी
वह एक नई शिक्षा क्रांति के जनक थे जिस के अंतर्गत देश के दूरदराज क्षेत्रों में विद्यालय बनाए , मदरसा निजामिया के नाम से युनिवर्सिटीज़ की एक श्रृंखला खोली सबसे बड़ी युनिवर्सिटी बगदाद में थी , इसके अलावा नीसापुर, बसरा , असफहान , बल्ख , हिरात , मर्व और मौसिल में भी मदरसा निजामिया युनिवर्सिटी बनाई गई


युनिवर्सिटी खोलना बड़ी बात नहीं थी असल मुश्किल था एक अच्छी शिक्षा नीति को लागू करना , युनिवर्सिटी का आर्थिक प्रबंध करना और बेहतरीन शिक्षकों की नियुक्ति करना निज़ामुल मुल्क ने सब कुछ करके दिखा दिया.


उस समय के बड़े विद्वानों से खुद मिले और बड़ी बड़ी तनख्वाहों पर उन्हे अपनी सेवाएं युनिवर्सिटीज को देने के लिए तैयार किया बग़दाद मदरसा निजामिया युनिवर्सिटी के वाइस चांसलर पद पर इमाम ग़ज़ाली जैसे विश्व स्तरीय विद्वान की नियुक्ति की , नीसापुर में इमामुल हरमैन अबुल मआली अल जूवैनी वाइस चांसलर थे , अबू इसहाक शिराज़ी और उमर खैयाम जैसे लोग इन युनिवर्सिटी से जुड़े थे उमर खैयाम के लिए एक बेहतरीन लैब तैयार किया उस समय पूरे विश्व में ऐसा लैब नहीं था.


आज दुनिया इमाम ग़ज़ाली और उमर खैयाम को जानती है फिलासफी , गणित और विज्ञान में इनके कामों को यूरोपीय वैज्ञानिकों ने भी सराहा है इनके इन कामों में जहां इनकी काबिलियत का हाथ है वहीं इनके लिए निज़ामुल मुल्क के आर्थिक संरक्षण का भी योगदान कम नहीं है.


निज़ामुल मुल्क से पहले विश्व में एक से एक लोग हुए हैं जिन्होंने शिक्षा के लिए बहुत कुछ किया पर शिक्षा के नाम पर वार्षिक बजट बनाने वाले वह पहले व्यक्ति हैं उन्होंने सरकारी आमदनी का दस प्रतिशत शिक्षा के लिए खास किया यह इतना ज्यादा था कि खुद बादशाह मलिक शाह सलजूकी घबरा गए और निज़ामुल मुल्क से पूछा भी कि यह बहुत ज्यादा नहीं है लेकिन निज़ामुल मुल्क ने उन्हें समझा लिया.


निज़ामुल मुल्क पर लिखने को बहुत कुछ है उनकी आर्थिक नीतियों और उनके दीनी ख़िदमात पर भी बात करने लायक़ है परंतु पोस्ट लंबी हो गई.

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History - تاریخ - इतिहास
जाने जबरदस्त योद्धा निज़ामुलमुल्क तूसी की कहानी जो इस्लामी इतिहास के सफलतम मंत्रियों में से एक Reviewed by Furkan S Khan on July 19, 2020 Rating: 5

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