Top Ad unit 728 × 90

Breaking News

random

जुल्म का जबर का सिसिला था एक तरफ सबर का सिसिला था बात जब हक़ व बातिल की आयी कर्बला का खयाल आगया है राही वास्तवि Rahi Vastavi - The Fakharpur City

 मुशायरा की जब बात आती तो हम सब के मन एक ही ख्याल आता है राहत इन्दोरी या मुनव्वर राणा जब हिंदुस्तान की बात आती है तो राहत की यह सायरी बहुत पढ़ने को मिलती है 


लगेगी आग तो आएंगे कई घर जद में यहां सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है 
सभी का खून सामिल है यहां की मिट्टी में किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी  

और जब माँ की बात आती है तो मुनव्वर राना जी की यह सायरी बहुत पढ़ी जाती है 

लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होतीबस एक माँ है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती
अब भी चलती है जब आँधी कभी ग़म की ‘राना’माँ की ममता मुझे बाहों में छुपा लेती है

लेकिन आज हम बात कर रहे हैं उस सख्सियत की जो किसी पहचान की मौहताज नही जी हां हम बात कर रहे हैं राही वास्तवि जी की जो नातिया मुशायरो में उन्होंने नज्म पढ़ी वो सायद ही अब कभी सुनने को मिलेगा आइये पढ़ते हैं उनके कुछ अल्फाज जो दिल मे इस्लाम के प्रति इत्तिहाद पैदा करते हैं

याद आई हैं अपनी खताइयें जब ख़ुदा का खयाल आगया है मेरे बेचैन दिल को वहीं पर मुस्तफा का खयाल आगया है


ये तो मरयम भी है हाजरा भी नेक खातून हैं आशय भी बात जब आगयी है हाया की अरे फातिमा का खयाल आगया है

जुल्म का जबर का सिसिला था एक तरफ सबर का सिसिला था बात जब हक़ व बातिल की आयी कर्बला का खयाल आगया है

मैने जब नाथ के आशआन से बातें की हैं यूं लगा है मुझे अहमद-ए-मुख्तार से बातें की हैं

ए-मेरे-प्यारे तखयुल तेरे सदक़े जवां तूने अख़्सर मेरे सरकार से बातें की हैं 

उसकी तारीफ में अल्फ़ाज़ भी कम पड़ जाएं जिसके एक सज्दे में तलवार से बातें की हैं

इश्क़-ए-सरकार में यह हाल हुआ है अक्सर मैंने घर के दरों दीवार से बातें की हैं 

क्यों न वो रहमते आलम हो जमाने के लिए जिसके किरदार ने संसार से बातें की है

अपनी उल्फत यह काम करती है हर नजर एहतराम करती है जो नबी पर सलाम पढ़ते हैं उनको दुनिया सलाम करती है

कहदो अब हुकूमत से डूब जाएं पानी में बेटियां भी लुटती हैं अपनी राजधानी में 

आज के जमाने में सब वही तो होता है वाक़या जो पढ़ते थे हम किसी कहानी में  

जहां जमाना मुसीबत में डाल देता है कर्म तुम्हारा वहीं पर संभाल देता है 

 वो खुद को जीते जी दोजख में डाल देता है जो बूढ़े बाप को घर से निकल देता है
दुवाएँ माँ की जो लेकर चला है साहिल से वो डूब जाइ तो दरया उछाल देता है कर्म तुम्हारा वहीं पर संभाल देता है 

तेरा सावन बिता जाइ मोरा सावन बिता जाए तेरे लिए उड़ कर आऊंगा चंद रहे या जाए ✍️ फुरकान एस खान की कलम से

आप हमसे ट्विटर इम्स्टग्राम फेसबुक यूट्यूब जुड़ सकते हो  दी फखरपुर सिटी को आगे बढ़ने के लिए सपोर्ट करें Click Here
जुल्म का जबर का सिसिला था एक तरफ सबर का सिसिला था बात जब हक़ व बातिल की आयी कर्बला का खयाल आगया है राही वास्तवि Rahi Vastavi - The Fakharpur City Reviewed by Furkan S Khan on April 13, 2018 Rating: 5

No comments:

All Rights Reserved by Hum Bahraich Ke Log © 2014 - 2015
Powered By Fakharpur News, Re-Designed by Furkan S Khan

Contact Form

Name

Email *

Message *

Powered by Blogger.